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अध्याय 10 · श्लोक 40विभूति योग

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श्लोक 40 / 42

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप। एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥

लिप्यंतरण

nānto ’sti mama divyānāṁ vibhūtīnāṁ parantapa eṣha tūddeśhataḥ prokto vibhūter vistaro mayā

शब्दार्थ (अन्वय)

na
not
antaḥ
end
asti
is
mama
my
divyānām
divine
vibhūtīnām
manifestations
parantapa
Arjun, the conqueror of the enemies
eṣhaḥ
this
tu
but
uddeśhataḥ
just one portion
proktaḥ
declared
vibhūteḥ
of (my) glories
vistaraḥ
the breath of the topic
mayā
by me

भावार्थ

हे परंतप अर्जुन ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है। मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियोंका जो विस्तार कहा है, यह तो केवल संक्षेपसे कहा है।

व्याख्या

"नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप, एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।" — हे परंतप, मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने जो कहा है वह मेरी महिमा के विस्तार का केवल संक्षिप्त संकेत है। श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं जो 10.19 ने पूर्व-सूचित किया: उन्होंने जो विभूतियों की सूची दी (10.20-38) वह पूर्ण नहीं — यह कभी नहीं हो सकती। 'न अन्तः अस्ति मम दिव्यानां विभूतीनाम्' — मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं। 'एष तु उद्देशतः प्रोक्तः' — मैंने जो कहा वह केवल संक्षिप्त संकेत है। शंकराचार्य इस कथन की ईमानदार विनम्रता पर बल देते हैं। अंतर्दृष्टि एक विनम्र और खुले देखने के तरीके को सुदृढ़ करती है: तुम्हें दिए गए उदाहरणों को कभी उस वास्तविकता की संपूर्णता मत समझो जिसकी ओर वे इशारा करते हैं। विशिष्ट उदाहरणों को हल्के से थामो, सीमाओं की बजाय द्वारों के रूप में। दिव्य महिमा का कोई अंत नहीं — जिसका मतलब है हमेशा और पहचानने को है। सूची सीमा नहीं है। हमेशा और है।

भगवद्गीता 10.40 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से अपनी सूची को एक पूर्ण चीज़ मानने की किसी भी प्रलोभन को बंद कर देते हैं: 'मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं; मैंने जो कहा वह केवल संक्षिप्त संकेत है।' सूची हमेशा संकेत थी, कभी पूर्ण सूची नहीं। अंतर्दृष्टि एक विनम्र, खुले देखने के तरीके को सुदृढ़ करती है: तुम्हें दिए उदाहरणों को कभी उस वास्तविकता की संपूर्णता मत समझो जिसकी ओर वे इशारा करते हैं। यह हठधर्मिता के विपरीत है। हठधर्मिता उदाहरणों को एक बंद प्रणाली में जमा देती है; वास्तविक खुलापन उन्हें एक शुरुआत मानता है। दिव्य महिमा का कोई अंत नहीं — हमेशा और पहचानने को है। जिज्ञासु रहो, खुले रहो, देखते रहो। सबसे गहरी चीज़ें कभी नहीं चुकतीं।

भगवद्गीता 10.40 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से अपनी लिस्ट को एक फिनिश्ड, कम्प्लीट चीज़ मानने के किसी भी टेम्पटेशन को क्लोज़ करते हैं: 'मेरी डिवाइन ग्लोरीज़ का कोई एंड नहीं; मैंने जो डिक्लेयर किया वह बस ब्रीफ इंडिकेशन है।' लिस्ट हमेशा पॉइंटर्स थी, कभी कम्प्लीट कैटलॉग नहीं। इनसाइट एक हम्बल, ओपन-एंडेड देखने के तरीके को रीइन्फोर्स करती है: तुम्हें दिए उदाहरणों को कभी उस रियलिटी की होलनेस मत समझो जिसकी ओर वे पॉइंट करते हैं। यह डॉग्मेटिज़्म के ऑपोज़िट है। डिवाइन ग्लोरी का कोई एंड नहीं — हमेशा और रिकग्नाइज़ करने को है। क्यूरियस रहो, ओपन रहो, देखते रहो। डीपेस्ट चीज़ें कभी रन आउट नहीं होतीं।

भगवद्गीता 10.40 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण अपने दिए सब उदाहरणों के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण साझा करते हैं: 'मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं! मैंने तुम्हें जो बताया वह बस एक छोटा स्वाद है — कुछ उदाहरण!' वे अर्जुन को याद दिला रहे हैं कि सूची पूर्ण नहीं — यह कभी पूर्ण नहीं हो सकती, क्योंकि भगवान की महिमा अंतहीन है! उदाहरण बस अर्जुन की आँखें पहचानने के लिए प्रशिक्षित करने को थे। यह हमें कुछ अद्भुत सिखाता है: हमेशा और खोजने को है! चाहे तुम कितना भी सीखो, हमेशा और है — अंतहीन और! तो जिज्ञासु रहो और विस्मय से अपनी आँखें खुली रखो! विस्मय कभी समाप्त नहीं होता!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।

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