अध्याय 10 · श्लोक 39— विभूति योग
Read this verse in English →यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
लिप्यंतरण
yach chāpi sarva-bhūtānāṁ bījaṁ tad aham arjuna na tad asti vinā yat syān mayā bhūtaṁ charācharam
शब्दार्थ (अन्वय)
- yat
- — which
- cha
- — and
- api
- — also
- sarva-bhūtānām
- — of all living beings
- bījam
- — generating seed
- tat
- — that
- aham
- — I
- arjuna
- — Arjun
- na
- — not
- tat
- — that
- asti
- — is
- vinā
- — without
- yat
- — which
- syāt
- — may exist
- mayā
- — me
- bhūtam
- — creature
- chara-acharam
- — moving and nonmoving
भावार्थ
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह बीज मैं ही हूँ; क्योंकि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है अर्थात् चर-अचर सब कुछ मैं ही हूँ।
व्याख्या
"यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन, न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।" — और हे अर्जुन, जो सब प्राणियों का बीज है, वह भी मैं हूँ। ऐसा कोई प्राणी, चर या अचर, नहीं जो मेरे बिना अस्तित्व में हो। विशिष्ट विभूतियों की लम्बी सूची (10.20-38) के बाद, श्रीकृष्ण अब एक व्यापक सारांश कथन देते हैं। 'यत् च अपि सर्वभूतानां बीजं तद् अहम्' — जो सब प्राणियों का बीज है, वह भी मैं हूँ। फिर व्यापक घोषणा: 'न तद् अस्ति विना यत् स्यात् मया भूतं चराचरम्' — ऐसा कोई प्राणी, चर या अचर, नहीं जो मेरे बिना अस्तित्व में हो। शंकराचार्य पूर्णता पर बल देते हैं: कुछ भी नहीं — एक भी जीवित प्राणी नहीं, एक भी निष्क्रिय वस्तु नहीं — दिव्य के बिना अस्तित्व में हो सकती है। अंतर्दृष्टि हमें व्यापक दृष्टि पर लौटाती है: दिव्य उपस्थिति विशेष, प्रभावशाली तक सीमित नहीं — यह बिल्कुल सब कुछ का आधार है, बिना अपवाद। अभी अपने चारों ओर देखो — तुम्हारी आँखें जिस भी चीज़ पर पड़ें, सामान्य या प्रभावशाली, उसी पवित्र आधार में टिकी है।
भगवद्गीता 10.39 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
विशिष्ट प्रभावशाली उदाहरणों की लम्बी सूची के बाद, श्रीकृष्ण उस अंतर्निहित सत्य पर पीछे हटते हैं जिसकी ओर वे इशारा कर रहे थे: 'ऐसा कुछ नहीं — चर या अचर — जो मेरे बिना अस्तित्व में हो।' विशिष्ट विभूतियाँ कभी दिव्य उपस्थिति की सीमा नहीं थीं — वे आँख को प्रशिक्षित करने के लिए जीवंत उदाहरण थे। असली सत्य कुल है। अंतर्दृष्टि पूरे अध्याय की पहचान को विस्तृत करती है: पवित्र केवल शिखरों में नहीं — यह समान रूप से सामान्य, विनम्र, अनदेखे का आधार है। हर एक चीज़ — तुम्हारे दिन के सबसे सामान्य क्षण सहित — उसी पवित्र आधार में टिकी है। अभी अपने चारों ओर देखो — कुछ भी इसके बाहर नहीं।
भगवद्गीता 10.39 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
स्पेसिफिक इम्प्रेसिव उदाहरणों की लम्बी लिस्ट के बाद, श्रीकृष्ण उस अंडरलाइंग ट्रुथ पर पुल बैक करते हैं जिसकी ओर वे पॉइंट कर रहे थे: 'ऐसा कुछ नहीं — मूविंग या अनमूविंग — जो मेरे बिना एग्ज़िस्ट करे।' स्पेसिफिक ग्लोरीज़ कभी डिवाइन प्रेज़ेंस की लिमिट नहीं थीं — वे आँख ट्रेन करने के लिए वर्बोज़ उदाहरण थे। रियल ट्रुथ टोटल है: NOTHING डिवाइन के बिना एग्ज़िस्ट करता है। सेक्रेड केवल पीक्स में नहीं — यह समान रूप से ऑर्डिनरी, हम्बल का ग्राउंड है। हर एक चीज़ — तुम्हारे दिन के सबसे म्यूंडेन मोमेंट सहित — उसी सेक्रेड ग्राउंड में रेस्ट करती है। अभी अपने अराउंड देखो — कुछ भी इसके बाहर नहीं।
भगवद्गीता 10.39 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
उन सब अद्भुत उदाहरणों को साझा करने के बाद, श्रीकृष्ण इसे एक विशाल सत्य से सारांशित करते हैं: 'ऐसा कुछ भी नहीं — एक भी चीज़ नहीं — जो मेरे बिना अस्तित्व में हो!' वे सब विशेष उदाहरण (सूरज, सागर, महान नायक) बस अर्जुन की आँखें प्रशिक्षित करने के लिए थे — पर असली सत्य और भी बड़ा है: भगवान बिल्कुल हर चीज़ के स्रोत और आधार हैं! इसका मतलब भगवान केवल बड़ी, फैंसी चीज़ों में नहीं — भगवान हर चीज़ में हैं, छोटी, सामान्य, रोज़मर्रा की चीज़ों सहित! हर पत्ता, हर कंकड़, हर सामान्य क्षण — वे सब भगवान की अद्भुत उपस्थिति में टिके हैं! तो अभी अपने चारों ओर देखो — सब कुछ उसी अद्भुत पवित्र उपस्थिति में थामा है!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।
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