अध्याय 10 · श्लोक 13— विभूति योग
Read this verse in English →गीता 10.13 अर्जुन की स्तुति आगे बढ़ाती है: सब ऋषि, दिव्य द्रष्टा और महान् मुनि श्रीकृष्ण के लिए यही कहते आए हैं — और अब श्रीकृष्ण स्वयं इसकी पुष्टि करते हैं। लम्बी परम्परा का साक्ष्य प्रत्यक्ष प्रकाशन से मिलता है।
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥
लिप्यंतरण
āhus tvām ṛiṣhayaḥ sarve devarṣhir nāradas tathā asito devalo vyāsaḥ svayaṁ chaiva bravīṣhi me
शब्दार्थ (अन्वय)
- āhuḥ
- — (they) declare
- tvām
- — you
- ṛiṣhayaḥ
- — sages
- sarve
- — all
- deva-ṛiṣhiḥ-nāradaḥ
- — devarṣhi Narad
- tathā
- — also
- asitaḥ
- — Asit
- devalaḥ
- — Deval
- vyāsaḥ
- — Vyās
- svayam
- — personally
- cha
- — and
- eva
- — even
- bravīṣhī
- — you are declaring
- me
- — to me
भावार्थ
अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।
व्याख्या
अर्जुन अपनी प्रशंसा जारी रखता है: 'सब ऋषि आपके बारे में यही कहते हैं, और दिव्य ऋषि नारद भी, साथ ही असित, देवल, और व्यास; और अब आप स्वयं मुझे ऐसा बताते हैं।' अर्जुन 10.12 में शुरू प्रशंसा को महान ऋषियों के प्राधिकरण का आह्वान करके पूरा करता है। श्रीकृष्ण की सर्वोच्च प्रकृति केवल उसका अपना व्यक्तिगत निष्कर्ष नहीं। 'आहुः त्वां ऋषयः सर्वे' — सब ऋषि आपके बारे में यही कहते हैं। वह कुछ महानतम नाम लेता है: नारद, असित, देवल, व्यास। और अंततः: 'स्वयं च एव ब्रवीषि मे' — और अब आप स्वयं मुझे सीधे बताते हैं। शंकराचार्य ध्यान देते हैं कि अर्जुन यहाँ सत्य के लिए कई प्राधिकरण स्रोत जुटाता है। अंतर्दृष्टि संतुलित है: वास्तविक पहचान तब मज़बूत होती है जब यह कई स्वतंत्र स्रोतों से पुष्ट होती है।
भगवद्गीता 10.13 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
अर्जुन अपनी पहचान को केवल अपनी व्यक्तिपरक भावना में नहीं, बल्कि नोट करता है कि यह कई स्वतंत्र स्रोतों से अभिसरित होती है: परम्परा भर महानतम ऋषियों की गवाही, विश्वसनीय शास्त्र, और श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष वचन। यह सच में अच्छी ज्ञानमीमांसा मॉडल करता है। अंतर्दृष्टि: वास्तविक सत्य तब मज़बूत होता है जब कई स्वतंत्र दिशाओं से पुष्ट हो। अर्जुन केवल अपनी भावना पर निर्भर नहीं, केवल परम्परा पर नहीं, केवल एक शिक्षक पर नहीं — वह नोट करता है कि वे सब संरेखित हैं। गलत सूचना के युग में यह मूल्यवान है: अभिसरण खोजो। जब कई स्वतंत्र विश्वसनीय स्रोत एक ही ओर इशारा करते हैं, यह वह सत्य है जिस पर तुम खड़े हो सकते हो।
भगवद्गीता 10.13 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
अर्जुन अपनी रिकग्निशन को केवल अपनी सब्जेक्टिव फीलिंग में ग्राउंड नहीं करता, बल्कि नोट करता है कि यह मल्टीपल इंडिपेंडेंट सोर्सेज़ से कन्वर्ज होती है: ट्रेडिशन भर ग्रेटेस्ट सेजेज़ की टेस्टिमनी, रिलायबल स्क्रिप्चर, AND कृष्ण का डायरेक्ट वर्ड। यह गुड एपिस्टेमोलॉजी मॉडल करता है। इनसाइट: रियल ट्रुथ तब स्ट्रॉन्ग होती है जब मल्टीपल इंडिपेंडेंट डायरेक्शन्स से कन्फर्म हो। अर्जुन केवल अपनी फीलिंग पर रिलाई नहीं करता, केवल ट्रेडिशन पर नहीं, केवल एक टीचर पर नहीं। मिसइन्फॉर्मेशन के एज में, कन्वर्जेंस खोजो। जब मल्टीपल रिलायबल सोर्सेज़ एक ओर पॉइंट करते हैं AND यह तुम्हारे ऑनेस्ट एक्सपीरियंस से मैच करता है, यह वह है जिस पर तुम खड़े हो सकते हो।
भगवद्गीता 10.13 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
अर्जुन श्रीकृष्ण की प्रशंसा जारी रखता है, पर वह कुछ समझदार जोड़ता है: वह बताता है कि यह केवल उसका अपना विचार नहीं कि श्रीकृष्ण सर्वोच्च भगवान हैं — सब सबसे बुद्धिमान ऋषियों ने यही कहा है, पवित्र शास्त्र यही कहते हैं, और श्रीकृष्ण स्वयं इसकी पुष्टि करते हैं! अर्जुन इस बारे में समझदार है कि वह चीज़ें कैसे जानता है: वह जाँचता है कि बहुत सारे अलग भरोसेमंद स्रोत सब सहमत हैं! यह सच पता लगाने का बढ़िया सबक है: केवल एक चीज़ पर निर्भर मत रहो! जब तुम्हारा अपना अनुभव, बुद्धिमान लोग जो कहते हैं, और भरोसेमंद स्रोत सब एक ओर इशारा करते हैं, तुम सच में आश्वस्त महसूस कर सकते हो!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 10.13 का अर्थ क्या है?
अर्जुन कहता है कि सब ऋषि, दिव्य द्रष्टा और महान् मुनि श्रीकृष्ण के लिए यही कहते आए हैं — और अब श्रीकृष्ण स्वयं इसकी पुष्टि करते हैं। लम्बी परम्परा का साक्ष्य प्रत्यक्ष प्रकाशन से मिलता है।
भगवद्गीता 10.13 किसने कहा?
यह अर्जुन ने कहा, दसवें अध्याय (विभूति योग) में, श्रीकृष्ण की स्तुति आगे बढ़ाते हुए।
गीता 10.13 आज के जीवन में कैसे उतारें?
जब विरासत में मिली बुद्धिमत्ता और तुम्हारा अपना ईमानदार अनुभव एक ही दिशा में इशारा करें, तुम उस दिशा पर भरोसा कर सकते हो। दोनों पक्षों से पुष्टि स्थिर करती है।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।
अध्याय पढ़ें →✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 10.13 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 10.13 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
The Divine Life Society (Swami Sivananda)
The Divine Life Society — institutional home of Swami Sivananda, whose English translation is cited on this site.
Divine Life Society →