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अध्याय 11 · श्लोक 48विश्वरूप दर्शन योग

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श्लोक 48 / 55

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥

लिप्यंतरण

na veda-yajñādhyayanair na dānair na cha kriyābhir na tapobhir ugraiḥ evaṁ-rūpaḥ śhakya ahaṁ nṛi-loke draṣhṭuṁ tvad anyena kuru-pravīra

शब्दार्थ (अन्वय)

na
not
veda-yajña
by performance of sacrifice
adhyayanaiḥ
by study of the Vedas
na
nor
dānaiḥ
by charity
na
nor
cha
and
kriyābhiḥ
by rituals
na
not
tapobhiḥ
by austerities
ugraiḥ
severe
evam-rūpaḥ
in this form
śhakyaḥ
possible
aham
I
nṛi-loke
in the world of the mortals
draṣhṭum
to be seen
tvat
than you
anyena
by another
kuru-pravīra
the best of the Kuru warriors

भावार्थ

हे कुरुप्रवीर! मनुष्यलोकमें इस प्रकारके विश्वरूपवाला मैं न वेदोंके पढ़नेसे, न यज्ञोंके अनुष्ठानसे, न दानसे, न उग्र तपोंसे और न मात्र क्रियाओंसे तेरे (कृपापात्रके) सिवाय और किसीके द्वारा देखा जाना शक्य हूँ।

व्याख्या

श्रीकृष्ण दर्शन की दुर्लभता पर बल देते हैं: 'न वेदों से, न यज्ञ या अध्ययन से, न दान से, न अनुष्ठानों से, न कठोर तप से, मनुष्य लोक में तुम्हारे अतिरिक्त कोई मुझे इस रूप में देख सकता है, हे कुरुवीर।' श्रीकृष्ण बल देते हैं कि ब्रह्मांडीय दर्शन किसी सामान्य साधन से प्राप्त नहीं किया जा सकता। शंकराचार्य बिंदु समझाते हैं: सर्वोच्च दर्शन किसी अभ्यास का स्वचालित परिणाम नहीं — अध्ययन नहीं, अनुष्ठान नहीं, दान नहीं, यहाँ तक कि कठोर तप नहीं। ये अच्छे अभ्यास अपना मूल्य रखते हैं, पर वे स्वयं इस दर्शन को उत्पन्न नहीं करते। अंतर्दृष्टि महत्त्वपूर्ण है: सबसे गहरे बोध किसी तकनीक से यांत्रिक रूप से खरीदे या अर्जित नहीं किए जा सकते। यह आध्यात्मिक जीवन के लेन-देन वाले दृष्टिकोण का एक गहन सुधार है। हम अक्सर सोचते हैं: अगर मैं बस सही अभ्यास करूँ, मुझे स्वचालित रूप से परिणाम मिलेगा। पर सबसे गहरी चीज़ें ऐसे लेन-देन से काम नहीं करतीं। सबसे गहरे लाभ — वास्तविक अंतर्दृष्टि, प्रेम, शांति — एक तकनीक तक कम नहीं किए जा सकते। अच्छे अभ्यासों का पीछा करो, पर उन्हें तैयारी और भेंट के रूप में थामो। सबसे गहरी चीज़ें पाई जाती हैं, खरीदी नहीं जातीं।

भगवद्गीता 11.48 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण सब उच्च-मूल्यवान आध्यात्मिक अभ्यास गिनाते हैं — अध्ययन, अनुष्ठान, दान, यहाँ तक कि कठोर तप — और कहते हैं इनमें से कोई भी, स्वयं, सर्वोच्च दर्शन उत्पन्न नहीं करता। अंतर्दृष्टि महत्त्वपूर्ण है: सबसे गहरे बोध किसी तकनीक से यांत्रिक रूप से खरीदे नहीं जा सकते। यह आध्यात्मिक जीवन के लेन-देन वाले दृष्टिकोण का एक गहन सुधार है। हम लगातार सोचते हैं: अगर मैं बस सही अभ्यास करूँ, मुझे स्वचालित रूप से परिणाम मिलेगा। पर सबसे गहरी चीज़ें ऐसे काम नहीं करतीं। यह इसका मतलब नहीं कि अभ्यास बेकार हैं — वे तैयार और शुद्ध करते हैं। पर वे सबसे गहरे उपहार की गारंटी नहीं देते। अच्छे अभ्यासों का पीछा करो, पर उन्हें तैयारी और भेंट के रूप में थामो। सबसे गहरी चीज़ें पाई जाती हैं, खरीदी नहीं जातीं।

भगवद्गीता 11.48 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण सब हाईली-वैल्यूड स्पिरिचुअल प्रैक्टिसेज़ लिस्ट करते हैं — स्टडी, रिचुअल, चैरिटी, यहाँ तक कि सीवियर ऑस्टेरिटी — और कहते हैं इनमें से कोई भी, खुद, सुप्रीम विज़न प्रोड्यूस नहीं करता। इनसाइट इम्पॉर्टेंट है: डीपेस्ट रियलाइज़ेशन्स किसी टेक्नीक से मैकेनिकली परचेज़ नहीं हो सकते। यह स्पिरिचुअल लाइफ के ट्रांज़ैक्शनल व्यू का प्रोफाउंड करेक्टिव है। हम कॉन्स्टेंटली सोचते हैं: अगर मैं बस राइट प्रैक्टिसेज़ करूँ, मुझे ऑटोमैटिकली रिज़ल्ट मिलेगा। हम डीपेस्ट चीज़ों को वेंडिंग मशीन्स की तरह ट्रीट करते हैं। पर डीपेस्ट चीज़ें ऐसे काम नहीं करतीं। यह इसका मतलब नहीं कि प्रैक्टिसेज़ वर्थलेस हैं — वे प्रिपेयर करती हैं। डीपेस्ट चीज़ें रिसीव की जाती हैं, परचेज़ नहीं। वर्क करो, फिर ओपन रहो।

भगवद्गीता 11.48 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कुछ आश्चर्यजनक समझाते हैं: यह अद्भुत ब्रह्मांडीय दर्शन केवल पवित्र किताबें पढ़कर, अनुष्ठान करके, उपहार देकर, या यहाँ तक कि बहुत कठिन अभ्यास करके नहीं पाया जा सकता! सबसे अच्छे, सबसे प्रभावशाली प्रयास भी इसे स्वचालित रूप से उत्पन्न नहीं करते! यह हमें कुछ महत्त्वपूर्ण सिखाता है: जीवन की सबसे गहरी, सबसे अद्भुत चीज़ें केवल एक रेसिपी की तरह सही कदमों का पालन करके 'खरीदी' या 'अर्जित' नहीं की जा सकतीं! हम कभी-कभी सोचते हैं: 'अगर मैं बस सब सही चीज़ें करूँ, मुझे स्वचालित रूप से इनाम मिलेगा!' पर सबसे बहुमूल्य चीज़ें ऐसे काम नहीं करतीं! वास्तविक प्रेम, सच्ची बुद्धि, गहरी शांति — ये एक खुले, प्रेमपूर्ण हृदय के माध्यम से उपहार के रूप में आती हैं! अच्छे अभ्यास और खुला हृदय दोनों रखो! सबसे अच्छी चीज़ें पाई जाती हैं, खरीदी नहीं जातीं!

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अध्याय सन्दर्भ

दिव्य दृष्टि पाकर अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट विश्वरूप का दर्शन करते हैं जिसमें समस्त लोक, देव और काल समाहित हैं। भयभीत होकर वे पुनः सौम्य रूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं।

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