अध्याय 11 · श्लोक 45— विश्वरूप दर्शन योग
Read this verse in English →गीता 11.45 एक मिश्रित भाव बताती है: जो पहले कभी नहीं देखा वह देखकर मैं हर्षित हूँ, पर मेरा मन भय से अभिभूत है — कृपा करें, देवों के ईश्वर, लोकों के आश्रय; मुझे वह रूप दिखाइए जिसे मैं जानता हूँ। आनंद और भय एक हृदय में साथ-साथ रह सकते हैं।
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥
लिप्यंतरण
adṛiṣhṭa-pūrvaṁ hṛiṣhito ’smi dṛiṣhṭvā bhayena cha pravyathitaṁ mano me tad eva me darśhaya deva rūpaṁ prasīda deveśha jagan-nivāsa
शब्दार्थ (अन्वय)
- adṛiṣhṭa-pūrvam
- — that which has not been seen before
- hṛiṣhitaḥ
- — great joy
- asmi
- — I am
- dṛiṣhṭvā
- — having seen
- bhayena
- — with fear
- cha
- — yet
- pravyathitam
- — trembles
- manaḥ
- — mind
- me
- — my
- tat
- — that
- eva
- — certainly
- me
- — to me
- darśhaya
- — show
- deva
- — Lord
- rūpam
- — form
- prasīda
- — please have mercy
- deva-īśha
- — God of gods
- jagat-nivāsa
- — abode of the universe
भावार्थ
मैंने ऐसा रुप पहले कभी नहीं देखा। इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और (साथ-ही-साथ) भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है। अतः आप मुझे अपने उसी देवरूपको (सौम्य विष्णुरूपको) दिखाइये। हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न होइये।
व्याख्या
अर्जुन श्रीकृष्ण से अपने परिचित रूप में लौटने को कहता है: 'जो पहले कभी न देखा उसे देखकर मैं प्रसन्न हूँ, फिर भी मेरा मन भय से काँप रहा है। मुझे, हे देव, आपका वह दूसरा रूप दिखाएँ। दया करें, हे देवेश, जगन्निवास।' अर्जुन, ब्रह्मांडीय रूप पूरी तरह देखकर, अब ईमानदारी से श्रीकृष्ण से अपने सौम्य, परिचित रूप में लौटने को कहता है। 'मैं प्रसन्न हूँ ... फिर भी मेरा मन भय से काँपता है।' अर्जुन दोनों ईमानदारी से थामता है। अंतर्दृष्टि दोहरी है। पहली, मिश्रित भावनाओं की ईमानदारी: अर्जुन प्रसन्नता और भय दोनों महसूस करता है, और दोनों को ईमानदारी से थामता है। यह भावनात्मक रूप से परिपक्व है। वास्तविक अनुभव अक्सर सच में मिश्रित होते हैं। दूसरी, जो तुम सच में सह सकते हो उसे माँगने की बुद्धि। 'यह मेरे लिए बहुत तीव्र है' कहने में कोई शर्म नहीं। कभी-कभी बुद्धि अधिकतम तीव्रता सहने पर खुद को धकेलने के बारे में नहीं, बल्कि ईमानदारी से अपनी वास्तविक क्षमता पहचानने के बारे में है। ऊँचाइयों के लिए अपनी लालसा और जो तुम सह सकते हो उसकी ईमानदार ज़रूरत दोनों का सम्मान करो।
भगवद्गीता 11.45 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
अर्जुन, जिस ब्रह्मांडीय दर्शन की लालसा की उसे पाकर, ईमानदारी से स्वीकार करता है कि यह अभिभूत करने वाला है और श्रीकृष्ण से अपने सौम्य, परिचित रूप में लौटने को कहता है। अंतर्दृष्टि दोहरी है। पहली, मिश्रित भावनाओं की ईमानदारी: अर्जुन प्रसन्नता और भय दोनों महसूस करता है, और दोनों को ईमानदारी से थामता है। यह भावनात्मक रूप से परिपक्व है। वास्तविक अनुभव अक्सर मिश्रित होते हैं। एक ही समय दो विरोधाभासी चीज़ें महसूस करना ठीक है। दूसरी, जो तुम सच में सह सकते हो उसे माँगने की बुद्धि। 'यह अभी मेरे लिए बहुत तीव्र है' कहने में कोई शर्म नहीं। कभी-कभी बुद्धि अधिकतम तीव्रता सहने के बारे में नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक क्षमता पहचानने के बारे में है। ऊँचाइयों की लालसा और जो तुम सह सकते हो उसकी ज़रूरत दोनों का सम्मान करो।
भगवद्गीता 11.45 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
अर्जुन, जिस कॉस्मिक विज़न की लॉन्गिंग की उसे फाइनली पाकर, ऑनेस्टली एडमिट करता है कि यह ओवरव्हेल्मिंग है और श्रीकृष्ण से अपने जेंटलर, फैमिलियर फॉर्म में लौटने को कहता है। इनसाइट दोहरी है। फर्स्ट, मिक्स्ड फीलिंग्स की ऑनेस्टी: अर्जुन डिलाइट AND फियर दोनों फील करता है, और दोनों को ऑनेस्टली होल्ड करता है। यह इमोशनली मैच्योर है। रियल एक्सपीरियंसेज़ अक्सर मिक्स्ड होते हैं — तुम ग्रेटफुल और अफ्रेड एक साथ फील कर सकते हो। सेकंड, जो तुम सच में हैंडल कर सको उसे माँगने की विज़डम। 'यह अभी मेरे लिए बहुत इंटेंस है' कहने में ज़ीरो शेम है। कभी-कभी विज़डम मैक्सिमम इंटेंसिटी सहने के बारे में नहीं, बल्कि अपनी रियल कैपेसिटी रिकग्नाइज़ करने के बारे में है। अपनी रियल कैपेसिटी जानना फेलियर नहीं — विज़डम है।
भगवद्गीता 11.45 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
अद्भुत पर अभिभूत करने वाले ब्रह्मांडीय रूप को देखने के बाद, अर्जुन ईमानदारी से श्रीकृष्ण को बताता है: 'मैं बहुत खुश हूँ कि मुझे कुछ ऐसा देखने मिला जो किसी ने कभी नहीं देखा — पर यह थोड़ा डरावना भी है, और मेरा मन हिल गया है! कृपया मुझे फिर अपना सौम्य, परिचित रूप दिखाएँ।' यहाँ दो अद्भुत सबक! पहला, अर्जुन एक साथ दो चीज़ें महसूस करता है — खुश और डरा — और वह ईमानदारी से दोनों स्वीकार करता है! यह ठीक है! कभी-कभी हम मिश्रित भावनाएँ महसूस करते हैं — उत्साहित और घबराए — एक साथ। तुम्हें दिखावा करने की ज़रूरत नहीं कि तुम केवल एक तरह महसूस करते हो! दूसरा, अर्जुन जो वह संभाल सकता है वह माँगता है। कभी-कभी सबसे बहादुर चीज़ ईमानदारी से 'यह अभी मेरे लिए बहुत ज़्यादा है' कहना है!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 11.45 का अर्थ क्या है?
अर्जुन उस को देखकर हर्षित है जो पहले कभी नहीं देखा, पर उसका मन भय से अभिभूत है; वह श्रीकृष्ण, देवों के ईश्वर और लोकों के आश्रय से, परिचित रूप दिखाने की प्रार्थना करता है। आनंद और भय एक हृदय में साथ-साथ रह सकते हैं।
यह श्लोक किसने कहा?
अर्जुन ने, ग्यारहवें अध्याय (विश्वरूप-दर्शन योग) में, फिर से परिचित रूप दिखाने की प्रार्थना करते हुए।
गीता 11.45 आज के जीवन में कैसे उतारें?
तुम किसी से चकित हो सकते हो और साथ ही चाहते हो कि वह तुम्हारे लिए कोमल रूप ले। उस कोमल रूप को माँगना दुर्बलता नहीं।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
दिव्य दृष्टि पाकर अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट विश्वरूप का दर्शन करते हैं जिसमें समस्त लोक, देव और काल समाहित हैं। भयभीत होकर वे पुनः सौम्य रूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं।
अध्याय पढ़ें →✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 11.45 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 11.45 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Sringeri Sharada Peetham
Sringeri Sharada Peetham — the principal seat of Advaita Vedanta in the lineage of Adi Shankaracharya.
Sringeri →